दोहा कतार
मैथिली ,गजल- दुखी राम।
माय हमरा जनम देलकै देलकै बाबुजी अपन प्यार।
गुरुजी हसा खेलाक दैछै निक संस्कार।
तुरन्त धराउ बौवाबुचिके हातमे किताब कापी ।
खोलत जिवनके बन्द ताला लक ज्ञानक चावी ।
पैइर लेत बौवाबुची त भेटत समाजमे इज्जत आ मान ।
बहैइक गेल दोसर दिस त होइब बेइजिती आ अपमान।
दैर्य धिरज करु और करु सहन
सबके मनोकामना पूरा होत बौवा बुचिके परहै बै तखन।
कतबो धन कमालेब अहा किछ नै हेत शिक्षा बिना।
स्कुल नै पठाइब त संस्कार पाइत कोना।
समय ए प पठाउ बौवा बुचिके पाइत निक शिक्षा।
उच्छ करत कुल अहाके पूरा करत इच्छा।
धन अहाके उपर छै ज्ञान बहुत भितर।
जे कोइ ज्ञान खोइज लेलक ओहे सबस सुपर।
















